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अपराधों में संयुक्त दायित्व का सिद्धांत (Principle of joint responsibility in Crimes ) सामान्य आशय (Common Intention)


वैसे तो किसी भी तो किसी भी आपराधिक कृत्य के लिए कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से ही जिम्मेदार होता है, परन्तु जहां कहीं पर कोई अपराधिक कृत्य दो या दो से अधिक व्यक्तियों द्वारा ऐसी परिस्थितियों में किया जाता है जहां यह सुनिश्चित करना मुश्किल हो जाता है कि वास्तव में अपराध किस व्यक्ति के द्वारा किया गया है तब उन सभी व्यक्तियों को संयुक्तरूप से उस अपराध के लिये उत्तरदायी माना जाता है।
   भारतीय दण्ड संहिता की धारा 34 से लेकर 38 तक तथा धारा 149 में उन सभी परिस्थितियों के बारे में प्राविधान दिये गये है जिनमे जिनमें संयुक्त आपराधिक उत्त्तरदायित्व को दण्डनीय बनाया गया है। इस लेख में धारा 34 भारतीय दण्ड संहिता में दिये गये सामान्य आशय से सम्बंधित प्राविधानों के बारे में ही चर्चा करेंगे, सामान्य उद्देश्य धारा 149 की चर्चा दूसरे लेख में करेंगे।
Highlight Ad Code सर्वप्रथम भारतीय दण्ड संहिता की धारा 34 में दिये गये प्राविधान पर एक नज़र डालते हैं।

Sec.34.IPC-Acts done by several persons in furtherance of common intention.—When a criminal act is done by several persons in furtherance of the common intention of all, each of such persons is liable for that act in the same manner as if it were done by him alone.

  धारा 34 भारतीय दण्ड संहिता में दिये गये उपरोक्त प्राविधान से स्पष्ट है कि " जब कोई आपराधिक कार्य कई व्यक्तियों द्वारा अपने सबके सामान्य आशय को अग्रसर करने में किया जाता है तब ऐसे व्यक्तियों में से हर व्यक्ति उस कार्य के लिये उसी प्रकार उत्तरदायी माना जायेगा मानो वह कार्य अकेले उसी ने किया हो"।
धारा 34 भा.दं.सं. के लिये प्रमुख शर्तें:- धारा 34 के लिये दायित्व के अधिरोपण के लिये निम्नलिखित शर्तों का होना आवश्यक है-
1- यह कि कोई आपराधिक कार्य किया गया हो,
2- यह कि आपराधिक कार्य दो या दो से अधिक व्यक्तियों द्वारा किया गया हो, तथा
3- यह कि आपराधिक कार्य कई व्यक्तियों द्वारा अपने सबके सामान्य आशय को अग्रसर करने में किया गया हो;
आपराधिक कार्य- धारा 34 भारतीय दण्ड संहिता के अनुसार जहां कही पर कोई आपराधिक कार्य दो या दो से अधिक व्यक्तियों द्वारा मिलकर किया जाता है, वहां वह आपराधिक कृत्य किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत कार्य को इंगित नही करता बल्कि उसके संयुक्त कार्यो की ओर इंगित करता है। लिहाज़ा धारा 34 के अनुसार आपराधिक कृत्य का तात्यपर्य कई व्यक्तियों द्वारा कारित किये गये कार्यों के सम्पूर्ण अनुक्रम में से है, जिन्हें इस संहिता के अंतर्गत दण्डनीय बनाया गया है।
सामान्य आशय क्या होता है:- वैसे तो सामान्य आशय को कई विधिवेत्ताओं द्वारा अलग अलग अर्थ दिये गये है, परन्तु सामान्य आशय के अर्थ को निम्नलिखित तरह से समझा जा सकता है-
1- सामान्य आशय में पूर्व निर्धारित योजना अन्तर्निहित होती है  सभी व्यक्तियों के मध्य आपराधिक कृत्य को कारित करने से पूर्व आपस मे विचार विमर्श होना चाहिये।
2- सामान्य आशय में परिणाम की कल्पना किये बिना आपराधिक कृत्य किये जाने की इच्छा शामिल होती है।
3- सामान्य आशय में घटित अपराध को गठन हेतु आवश्यक आपराधिक मनःस्थिति होनी चाहिए।
4- इसका अर्थ किसी भी प्रकार के आपराधिक कृत्य करने के आशय से भी है, परन्तु यह आवश्यक नही है कि वही अपराध घटित हुआ हो।
5- सामान्य आशय का वास्तविक अर्थ प्रत्येक मामले की परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है।
 सामान्य आशय को अग्रसर करना:- सामान्य आशय को अग्रसर करने का सीधा मतलब किसी पूर्व निर्धारित योजना के अनुक्रम में किसी आपराधिक कार्य को अंजाम देने से है। यदि अपराध को कारित करने वाली पूर्व निर्धारित योजना को कार्य के रूप में परिणिती न किया जाय, तो कोई भी आपराधिक कार्य नही होता और ऐसी स्थिति में यह धारा लागू नही होती।

क्या सामान्य आशय को अग्रसर करने हेतु अभियुक्त की उपस्थिति आवश्यक है?
धारा 34 भारतीय दण्ड संहिता के अनुसार सामूहिक रूप से किसी आपराधिक कृत्य को अंजाम देने के लिये  अपराध करते समय सभी अभियुक्तों की भौतिक उपस्थित घटना स्थल पर आवश्यक नही है। अभियुक्त घटना स्थल से दूर रहकर भी अपराध कारित करने में अपना योगदान दे सकता है। जैसे अपराध को अंजाम देने के लिये संसाधनों (हथियार आदि) की व्यवस्था करके, या फिर पूर्व निर्धारित योजना के किसी भी अनुक्रम में शामिल होकर। परन्तु जहाँ कही पर किसी लोकसेवक के ऊपर धारा 409 भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत कोई आरोप लगाया गया है और वह लोकसेवक किसी कार्यालय का इन्चार्ज है, तो ऐसे अपराध के कारित करने के लिये उस लोकसेवक को कार्यालय में उपस्थिति होना आवश्यक है।
सामान्य आशय घटना स्थल पर भी उत्पन्न हो सकता है:-यद्यपि सामान्य आशय पूर्व निर्धारित योजना के अनुसरण में किये गये कृत्य का परिणाम होता है, परन्तु कुछ विशिष्ठ परिस्थितियों में सामान्य आशय घटना स्थल पर भी उतपन्न हो सकता है जिसे मामले के तथ्य तथा परिस्थितियों और अभियुक्त के आचरण व्यवहार से निश्चित किया जा सकता है।
  यह भी विदित हो कि धारा 34 में किसी भी तरह का दण्ड का प्राविधान नही है बल्कि यह धारा अपराध कृत्य से सम्बंधित धाराओं के साथ लगाई जाती है जहां इस तरह की परिस्थितियां उपलब्ध होती है।
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Tags-Comman Intention, सामान्य आशय, संयुक्त दायित्व, अपराध, उद्देश्य,

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