Skip to main content

ससुराल में पत्नी के कानूनी अधिकार (Legal right of wife in husband's house )

भारत का कानून शादीशुदा महिलाओं को ससुराल में कई तरह के विधिक अधिकार देता है, परन्तु महिलाओं को अपने कानूनी अधिकारों की जानकारी न होने के कारण महिलायें अत्याचार सहने पर मजबूर होती है। आये दिन अखबारों या सूचना के अन्य साधनों के माध्यम से यह खबरें मिलती रहती है कि दहेज़ की मांग को लेकर महिलाओं की हत्या तक कर दी जाती है या फिर महिला को शारीरिक और मानसिक रूप से इतना ज्यादा प्रताड़ित किया जाता है कि वह मजबूर होकर आत्म हत्या कर लेती है। ससुराल में महिलाओं के साथ घरेलू हिंसा की घटनायें भी आम हो गयी है, आंकड़े यह भी बताते है कि लॉकडाउन के दौरान घरों के अंदर घरेलू हिंसा की घटनाओं में बढोत्तरी हुई है। इस लेख में शादीशुदा महिलाओं को भारत के कानून में कौन-कौन से महत्वपूर्ण कानूनी अधिकार दिये गये है, उन्ही अधिकारों के बारे में चर्चा करते हैं।

      भारत मे महिलाओं को जो कानूनी अधिकार दिये गये है उन अधिकारों को निम्नलिखित रूप से विभाजित किया जा सकता है-
1- गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार;
2- भरण-पोषण प्राप्त करने का अधिकार;
3- स्त्रीधन को प्राप्त करने का अधिकार;
4- पति के साथ समर्पित रिश्ते में रहने का अधिकार;
5- दहेज़ की मांग को लेकर प्रताड़ित करने पर, कार्यवाही का अधिकार;
6- किसी भी तरह की घरेलू हिंसा करने पर, कार्यवाही का अधिकार;

 1- गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार:- एक महिला को शादी के पूर्व या शादी के बाद, एक पुरुष की तरह ही गरिमापूर्ण जीवन का संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में यह कहा गया है कि " किसी भी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अलावा उस व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जीवन जीने के अधिकार से वंचित नही किया जा सकता "। गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार भी इसी में समाहित है, इस प्रकार से भारत के संविधान का अनुच्छेद 21 किसी भी महिला या पुरुष को एक गरिमापूर्ण जीवन जीने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है, यदि किसी भी महिला के साथ ससुराल में किसी तरह का भेदभाव किया जा रहा है तो वह महिला अपने इस मौलिक अधिकार का संरक्षण करने के लिये माननीय उच्च न्यायालय एवम माननीय सर्वोच्च न्यायालय में संविधान के तहत याचिका दाखिल कर सकती है।

2- भरण-पोषण प्राप्त करने का धिकार:- शादी के बाद किसी भी महिला को अपने पति से उसकी आय के हिसाब से भरण- पोषण प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त होता है। धारा-125 दण्ड प्रक्रिया संहिता में माता-पिता, बच्चों के साथ साथ एक ऐसी पत्नी को भी गुजारा- भत्ता प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त है जो अपना भरण- पोषण करने में असमर्थ है।
   धारा-125CrPC में ऐसी महिला भी अपने पति से भरण-पोषण प्राप्त कर सकती है, जिसने अपने पति से विवाह विच्छेद कर लिया है परन्तु दूसरा विवाह नही किया है अर्थात तलाकशुदा पत्नी को भी अपने पूर्व पति से गुजारा-भत्ता प्राप्त करने का  अधिकार प्राप्त है। पति के द्वारा अपनी पत्नी की उपेक्षा करने पर वह अपने लिये और अपने बच्चों के लिये गुजारा- भत्ता प्राप्त करने हेतु धारा 125 CrPC के तहत मजिस्ट्रेट की अदालत में मुकदमा दाखिल कर सकती है।

3- स्त्रीधन को प्राप्त करने का अधिकार:- विवाह के उपरांत प्रत्येक महिला को यह अधिकार प्राप्त होता है कि उसे विवाह में जो भी जेवरात, उपहार, आदि प्राप्त हुआ है वो उसको मिले। महिला को विवाह में किसी के भी द्वारा कली सामान, जेवरात या कोई भी उपहार दिया जाय, चाहे वर पक्ष ने दिया हो या वधु पक्ष की ओर से दिया गया हो या फिर किसी भी पक्ष के दोस्त, रिश्तेदार और शुभचिंक्तक द्वारा दिया गया हो उस समस्त सामान स्त्रीधन कहलाता है और ऐसे स्त्रीधन पर पूर्णरूप से महिला का ही अधिकार होता है। ससुराल में पति या किसी अन्य ससुरालीजन के द्वारा यदि महिला को उसे विवाह में प्राप्त स्त्रीधन से वंचित किया जाता है तो वह महिला अपने स्त्रीधन को पाने के लिये पति या पति के अन्य ससुराल वालों के विरुद्ध धारा-406 भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत आपराधिक मुकदमा कर सकती है जो एक अजमानतीय अपराध होता है। धारा-406 IPC के अपराध में साबित हिने पर 3 वर्ष तक कि सज़ा हो सकती है।

4- पति के साथ समर्पित रिश्ते में रहने का अधिकार:- एक विवाहित महिला का यह अधिकार होता है कि उसका पति उसके साथ समर्पित रिश्ते में रहे, उसके किसी भी महिला से अवैध संबंध न हो। समर्पित रिश्ते में रहने का अधिकार पति वॉर पत्नी दोनों को ही प्राप्त होता है, दोनो ही एक दूसरे से यह अपेक्षा करते हैं कि पति- पत्नी का एक दूसरे के अलावा किसी अन्य के साथ कोई नाजायज रिश्ता न हो।
  यदि पति-पत्नी एक दूसरे के अलावा किसी अन्य के साथ अवैध रिश्ता रखतें है तो यह कृत्य एक दूसरे के साथ मानसिक क्रूरता में आयेगा। मानसिक क्रूरता के आधार पर पति या पत्नी रक दूसरे से तलाक ले सकती है।
  आपको बता दूं कि यदि पत्नी का अपने पति के अलावा किसी अन्य पुरुष के साथ अवैध सम्बन्ध धारा-497 भारतीय दण्ड संहिता के अनुसार जारकर्म का अपराध होता है, जिसके तहत पत्नी के विरुद्ध आपराधिक वाद चलाया जा सकता था, परन्तु गतवर्ष माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 497 IPC को असंवैधानिक मानते हुये निरस्त कर दिया है। धारा 497IPC अभी भी तलाक़ लेने का एक आधार बनी हुई है।

दहेज़ की मांग को लेकर प्रताड़ित करने पर कार्यवाही करने का अधिकार:-  ससुराल में यदि किसी भी महिला से पति या पति के रिश्तेदारों द्वारा दहेज़ की मांग की जाती है और दहेज़ की मांग को लेकर महिला को शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है तो महिला को यह अधिकार प्राप्त है कि वह अपने पति और अन्य ससुराल वालों के विरुद्ध दहेज उत्पीड़न, गाली-गलौज, मारपीट और जन से मारने की धमकी तथा दहेज़ की मांग के सम्बंध में भारतीय दण्ड संहिता की धारा-498A, 323, 504,506 IPC एवं धारा-3/4 दहेज़ प्रतिषेध अधिनियम में आपराधिक मुकदमा पंजीकृत करवा सकती है। भारत का कानून किसी भी प्रकार की दहेज़ की मांग करना या दहेज़ की मांग को लेकर किसी महिला के साथ गाली-गलौज, अभद्रता, मारपीट कर शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करने को पूरी तरह प्रतिबंधित करता है, यदि कोई व्यक्ति ऐसा कृत्य करता गई तो वह कानूनी अपराध होता है। यह भी देखने मे आया है कि दहेज़ उत्पीड़न की सच्ची घटनाओं के साथ साथ कुछ महिलाओं के द्वारा इसका दुरुपयोग भी किया जाता है, लेकिन यह भी सत्य है कि दहेज़ रूपी दानव प्रतिदिन कई महिलाओं का जीवन नर्क बनाये रहता है।

6- किसी भी तरह की घरेलू हिंसा करने पर कार्यवाही करने का अधिकार:- ससुराल में महिलाओं के साथ घरेलू ही की घटनायें आम बात हो गयी है। दिन-प्रति-दिन घरेलू हिंसा की घटनाओं में बढोत्तरी को देखते हुये भारत सरकार द्वारा घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005, पारित किया गया था।  घरेलू हिंसा अधिनियम का दायरा काफी बृहद है, इसमें मुख्यरूप से निम्नलिखित तरह की हिंसा को शामिल किया गया है-
(a) शारीरिक हिंसा (Physical Abuse)
(b) मानसिक और भावनात्मक हिंसा (Mental and Emotional Abuse)
(c) लैंगिक हिंसा (Sexual Abuse)

किसी भी विवाहित महिला के साथ यदि मारपीट कर उसे क्षति पहुचाकर उसके साथ शारीरिक हिंसा की जाती है, या फिर गाली-गलौज और अभद्र व्यवहार करके या ताने देकर मानसिक और भावनात्मक हिंसा की जाती है तथा किसी भी तरह की लैंगिक हिंसा की जाती है तो वह ससुराल पक्ष के विरुद्ध घरेलू हिंसा के तहत मजिस्ट्रेट की अदालत में वाद दाखिल कर सकती है। घरेलू हिंसा कानून के अंतर्गत एक महिला पति की साझी ग्रहस्थी में रहने का अधिकार, भरण-पोषण का अधिकार, बच्चे की अभिरक्षा का अधिकार भी मांग सकती है। इस प्रकार से एक महिला से ससुराल में मुख्य कानूनी /विधिक (Legal) अधिकार होते है। अगर महिलाएं अपने इन कानूनी अधिकारों के प्रति जागरूक होगी तो अपने होने वाली इन ज़्यादतियों/हिंसा के विरुद्ध आवाज उठाकर उनसे बच सकती है तथा विधिक कार्यवाही भी कर सकती है।
Tag:- Dowery, Tourcher, Harassment, Domestic Violence, Adultery, Bigamy, Sexual harassment

You tube Link..

https://www.youtube.com/c/LegalandsocialawarenessByKarimAhmadAdvocate

Comments

Popular posts from this blog

Mens Rea (दुराशय ) अपराध दण्ड संहिता का एक प्रमुख तत्व है।

न्यायमूर्ति कोक ने अपनी पुस्तक 'थर्ड इंस्टीट्यूट' सन्त अगस्ताइन के धर्मोपदेश का आधार लेते हुये एक सूत्र का प्रयोग किया है। यह सूत्र है -     "ACTUS NON FACIT REUM NISI MENS SIT REA" (ऐक्ट्स नॉन फेसिट रियम निसी मेन्स सिट रिया )  इसका अर्थ है कि दुराशय के बिना केवल कार्य किसी व्यक्ति को अपराधी नही बनाता। आज यह सूत्र अंग्रेजी आपराधिक विधि का अधार-स्तंभ बन गया है। यह सूत्र उतना ही प्राचीन है जितनी अंग्रेजी दाण्डिक विधि ।     उपरोक्त सूत्र का विश्लेषण करने से यह सुनिश्चित होता है कि किसी कृत्य को अपराध मानने के लिये दो आवश्यक तत्वों का होना आवश्यक है-- 1-   शारीरिक या भौतिक कृत्य  (Actus Reus ) 2-    मानसिक तत्व या दुराशय   (Mens Rea  )    उपरोक्त दोनों तत्वों को विस्तार से समझते हैं :- (1) शारीरिक या भौतिक कृत्य (Actus Reus ) शारीरिक या भौतिक कृत्य से तात्पर्य  सकारात्मक तथा नकारात्मक दोनो तरह से कार्यो से है। सकारात्मक कृत्य (Positive action)  से तात्पर्य किसी मनुष्य की सकारात्मक गतिविधि से...

क्या कहती है धारा 151crpc..?? ( Section-151 CrPC. )

दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की  धारा 151 , पुलिस की निवारक शक्ति (Preventive Power) है, जिसके अंतर्गत संज्ञेय अपराधों को कारित होने से को रोकने के लिए गिरफ्तारी की जा ती है,जिससे कि संज्ञेय अपराधों को होने से रोका जा सके। जहां दो पक्षो के मध्य झगड़े की संभावना होती है वहां पुलिस धारा 151 के अंतर्गत दोनो या एक पक्ष को गिरफ्तार करके मजिस्ट्रेट के  समक्ष प्रस्तुत करती है ।   क्या कहती है धारा 151 crpc :- The Code of Criminal Procedure, 1973 / Arrest to prevent the commission of cognizable offences. (1) A police officer knowing of a design to commit any cognizable offence may arrest, without orders from a Magistrate and without a warrant, the person so designing, if it appears to such officer that the commission of the offence cannot be otherwise prevented. (2) No person arrested under sub-section (1) shall be detained in custody for a period exceeding twenty-four hours from the time of his arrest unless his further detention is required or authorised under a...