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सर्वोच्च न्यायालय ने अधिवक्ता संगठनों के तीन पदाधिकारियों को न्यायालय की अवमानना की सज़ा सुनाई।


  27 अप्रैल 2020 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय की दो न्यायमूर्तियों की खंडपीठ ने विभिन्न अधिवक्ता संगठनों के तीन पदाधिकारियों को न्यायालय के अवमानना की सज़ा सुनाई।।
     न्यायालय की खण्डपीठ में न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति अनिरुद्ध बोस शामिल थे, जिन अधिवक्ताओं को न्यायालय की अवमानना की सज़ा दी है उनके नाम इस प्रकार है:-
1-विजय कुरले (राज्य अध्यक्ष महाराष्ट्र और गोवा इंडियन बार एसोसिएशन)
2- राशिद खान पठान (राष्ट्रीय सचिव-मानवाधिकार सुरक्षा परिषद)
3- नीलेश ओझा (राष्ट्रीय अध्यक्ष इण्डियन बार एसोसिएशन)
 
      आपको बता दें कि वर्ष 2019 मार्च  में एडवोकेट मैथ्यूज़ नेदुम्परा को न्यायमूर्ति आर.एफ. नारीमन और न्यायमूर्ति विनीत सरन ने एक मामले में न्यायालय की अवमानना का दोषी ठहराया था, इसी मामले में उक्त अधिवक्ता संगठनों के ओदधिकारियों द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों को शिकायती प्रार्थना पत्र लिखे थे।.
    पीठ ने अपने फैसले में कहा कि न्यायमूर्ति नारीमन और न्यायमूर्ति विनीत सरन के विरुद्ध शिकायती प्रार्थना पत्र पर उक्त अधिवक्ताओं ने बहुत ही घिनौने और निंदनीय आरोप लगाये हैं, कोर्ट ने कहा कि ऐसा लग रहा है कि ये लोग अधिवक्ता मैथ्यूज़ नेदुम्परा के लिए छदम लड़ाई लड़ रहे थे।
   सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने कहा कि - इसमें कोई शक नही कि यह शिकायत विजय कुरले  द्वारा न्यायधीशों को डराने के लिऐ की गई है ताकि नेदुम्परा के विरुद्ध कार्यवाही न हो सके।
 पीठ ने बार पर एक बड़ी टिप्पड़ी करते हुऐ कहा कि --

    " बार के कुछ सदस्य न्यायपालिका को आपराधिक कार्यवाही की धमकी देते हैं, यदि इस प्रवृत्ति से दृढ़ता से नही निपटा जाता है तो कोई भी पक्ष जिसके ख़िलाफ़ मामला दर्ज़ किया जाता है, वह न्यायधीशों के ख़िलाफ़ आपराधिक मामले दर्ज़ करना शुरू कर देगें"


     पीठ ने यह भी कहा कि किसी भी  मुुुक़दमेबाज केे, जज की अखण्डता के ऊपर सवाल उठाने का अधिकार नही है, किसी को भी जज की काबिलियत पर सवाल करने का हक़ नही है, यदि ऐसा होता है तो यह संस्थान पर हमला होगा, कानून की महिमा पर हमला होगा।



    शीर्ष अदालत ने याद दिलाया कि बेंच और बार के बीच संबंध एक-दूसरे के लिए परस्पर सम्मान के साथ सौहार्दपूर्ण होने चाहिए। पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी मुकदमेबाज को एक न्यायाधीश के लिए विशेष मकसद का अधिकार नहीं है।

   इस प्रकार से माननीय सर्वोच्च न्यायालय की पीठ  ने माना की इन लोगो द्वारा भेजे गये शिकायती पत्र में लिखी गई बातें अपमानजनक, निन्दनीय है। इसलिये अवमानना की कार्यवाही किया जाना पीठ नेे ज़रूरी समझा।।
 
Tag:- Court of Contempt, Supreme Court, Advocates, 
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