अपराध के प्रकार:-
अपराधों को दण्ड प्रक्रिया संहिता में दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है-:
(अ) संज्ञेय अपराध (Cognizable offence)
(ब)असंज्ञेय अपराध (Non-Cognizable offence)
अपराधों को दण्ड प्रक्रिया संहिता में दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है-:
(अ) संज्ञेय अपराध (Cognizable offence)
(ब)असंज्ञेय अपराध (Non-Cognizable offence)
प्रथम सूचना रिपोर्ट (First information repo)
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 154 में यह प्राविधान दिया गया है कि संज्ञेय अपराधों को कारित किये जाने की जो सूचना होगी उसे प्रथम सूचना रिपोर्ट कहा जायेगा, ऐसी सूचना राज्य सरकार द्वारा प्राधिकृत पंजिका में दर्ज किया जाता है जिसे रोजनामचा कहते है, इससे स्पष्ट है कि संज्ञेय अपराध के किये जाने की जो सूचना पुलिस स्टेशन में दर्ज कराई जाती है उसे प्रथम सूचना रिपोर्ट (First information report) कहते हैं।
असंज्ञेय अपराधों की सूचना (Non-Cognizable report-NCR)
धारा 155 दण्ड प्रक्रिया संहिता में असंज्ञेय मामलों की सूचना दी जाती है, असंज्ञेय अपराधों की सूचना दर्ज़ किये जाने के लिये भी राज्य सरकार द्वारा प्राधिकृत पुस्तक होती है उसी पुस्तक में असंज्ञेय अपराध की सूचना दर्ज़ की जाती है। इससे स्पष्ट है कि असंज्ञेय अपराधों की सूचना को Non-Cognizable report NCR कहा जाता है।
FIR और NCR में अंतर:-
प्रथम सूचना रिपोर्ट जिसे FIR कहते है ,के दर्ज़ हो जाने के बाद थाने के भारसाधक अधिकारी को उस मामले में विवेचना करने की शक्तियां प्राप्त हो जाती है, पुलिस अधिकारी को संज्ञेय मामलों में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होने के बाद धारा 156 CrPC के अंतर्गत मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना ही विवेचना की शक्ति होती है। FIR दर्ज़ होने के बाद विवेचना में यदि मामला सच पाया जाता है तो विवेचक धारा 41CrPC के प्राविधानों को दृष्टिगत रखते हुए आरोपी को बिना वारंट के गिरफ्तार भी कर सकता है, जबकि असंज्ञेय मामलों में धारा 155(2)CrPC के अंतर्गत बिना मजिस्ट्रेट की अनुमति के विवेचना नही की जा सकती और बिना वारण्ट के आरोपी को गिरफ्तार भी नही किया जा सकता है। जहाँ मामले का सम्बंध ऐसे दो या अधिक अपराधों से है, जिनमे से कम से कम एक संज्ञेय है, वहां दूसरे मामले के असंज्ञेय होते हुये यह मामला संज्ञेय माना जायेगा।।
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Tags:-FIR, NCR, Cognizable, Non-Cognizable, Police officer, Investigation, Arrest,
प्रथम सूचना रिपोर्ट जिसे FIR कहते है ,के दर्ज़ हो जाने के बाद थाने के भारसाधक अधिकारी को उस मामले में विवेचना करने की शक्तियां प्राप्त हो जाती है, पुलिस अधिकारी को संज्ञेय मामलों में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होने के बाद धारा 156 CrPC के अंतर्गत मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना ही विवेचना की शक्ति होती है। FIR दर्ज़ होने के बाद विवेचना में यदि मामला सच पाया जाता है तो विवेचक धारा 41CrPC के प्राविधानों को दृष्टिगत रखते हुए आरोपी को बिना वारंट के गिरफ्तार भी कर सकता है, जबकि असंज्ञेय मामलों में धारा 155(2)CrPC के अंतर्गत बिना मजिस्ट्रेट की अनुमति के विवेचना नही की जा सकती और बिना वारण्ट के आरोपी को गिरफ्तार भी नही किया जा सकता है। जहाँ मामले का सम्बंध ऐसे दो या अधिक अपराधों से है, जिनमे से कम से कम एक संज्ञेय है, वहां दूसरे मामले के असंज्ञेय होते हुये यह मामला संज्ञेय माना जायेगा।।
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